स्वर्ग का सुख

अभयारण्य में चंपा नाम की एक बंदरिया रहा करती थी। उसे बच्चों से बड़ा प्यार था, पर दुःख की बात थी उसके अपना कोई बच्चा न था इस बात से रात-दिन खिन्न रहा करती थी।

तब उसके पति ने उसे समझाया ‘देखो चंपा, यों मन ही मन घुलने से कोई फायदा नहीं, उल्टे तुम्हारा स्वास्थ्य और नष्ट हो जाएगा। तुम औरों के बच्चों को प्यार किया करो, उनकी सेवा किया करो ! हो सकता है भगवान् प्रसन्न होकर तुम्हें भी बच्चा दे दें।

चंपा को पति की बात अच्छी लगी। अब वह दूसरी बंदरिया के बच्चों की सेवा-सहायता करने लगी। वह उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाती, अच्छी बातें सिखाती और खाने की चीजें देती। जल्दी ही पास-पड़ौस के सारे बच्चे उससे खूब घुल-मिल गए। वे ‘मौसीजी-मौसीजी’ कहकर उसके पीछे आगे-पीछे घूमते रहते।

संयोग की बात कि एक वर्ष बाद चंपा के अपना एक बच्चा भी हो गया, वह बड़ी प्रसन्न हुई । ‘मैं बेटे को गुणवान बनाऊँगी, परिश्रमी बनाऊँगी, बहुत अच्छा बनाऊँगी’ उसके जन्म के समय चंपा ने मन ही मन सोचा ।

चंपा ने अपने बच्चे का बड़े ध्यान से लालन-पालन किया। वह उसकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखती। कुछ बड़े होने पर चंपा ने उसे शिक्षा देना भी प्रांरभ कर दिया। कुछ ही वर्षों में उसका बेटा किशू बड़ा ही गुणवान् और ज्ञानवान् बन गया।

जो उसे देखता उससे बातें करता, उसके साथ रहता, उसका जी प्रसन्न हो जाता। वह बड़ा ही विनम्र-मीठा बोलने वाला, दूसरों की सहायता करने वाला और सभी का सम्मान करने वाला था, यही वे गुण हैं जिनके कारण दूसरे हमें आदर और स्नेह दिया करते हैं। किशू जब युवा हुआ तो अनेक बंदर यह चाहने लगे कि उनकी बेटी का विवाह उससे हो जाए।

वे उसके गुणी स्वभाव से परिचित थे और अच्छी तरह समझते थे कि उनकी बेटी को यह सदैव सुखी रखेगा। धन-संपत्ति तो नष्ट हो सकती है, पर गुणों की सपत्ति कभी नष्ट नहीं हुआ करती ।

किशू का विवाह काली नामकी एक बंदरिया के साथ हो गया। किशू जितना गुणी था, विनम्र था काली उतनी ही झगडालू और क्लेश करने वाली । वह छोटी-छोटी बात पर लड़ाई करती। किशू की बूढ़ी माता उसे फूटी आँखों भी न सुहाती।

बात-बात में किशू से वह उनकी बुराई किया करती। इस बात पर जब किशू उसे डाँटता तो वह फफक-फफक कर रोने लगती। ऐसे जीवन से किशू बड़ा ही दुःखी हो गया। कहाँ नरक में आ फँसा हूँ’ मन ही मन वह सोचा करता।

अब उसकी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई कि बुजुर्ग क्यों इस बात को कहा करते हैं कि गृहिणी से ही घर बनता है अतएव वधू के चुनाव में गुणों को प्रमुख स्थान देना चाहिए।

हम जैसे व्यक्ति के साथ रहते हैं उसके आचार-व्यवहार का गुणों का स्वभाव का सूक्ष्म प्रभाव निःसंदेह हम पर पड़ता है। किशू भी अनजाने में धीरे-धीरे काली से प्रभावित हो रहा था।

काली के भड़काने से एक दिन वह अपनी माँ से लड़ पड़ा। काली तो पूरी महाकाली थी। उसने किशू को माँ के विरुद्ध और भरा। उसी रात वे दोनों चंपा को अकेली छोड़कर वहाँ से चल पड़े। रात भर और दिनभर वे चलते रहे, और दूर एक जंगल में जाकर उन्होंने डेरा डाला।

वहाँ किशू और काली ने अपनी सुख सुविधा की सारी सामग्री जुटा ली । किशू को जब काली के साथ अकेले रहने का अवसर मिला तब वह समझा कि उसका स्वभाव कितना उग्र है। ‘ओह’ माँ की नहीं सारी गलती इसी की है, यह बात भी उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गई।

किशू जब-तब बैठकर अपनी माँ की याद करता। जब भी वह उसके विषय में सोचता उसका दिल भर आताबचपन से लेकर बड़े होने तक की सारी घटनाएँ एक-एक करके उसकी आँखों के आगे घूम जातीं।

माँ का स्नेह, उसका त्याग सभी कुछ उसे याद आने लगते, ‘ओह, ऐसी ममतामयी माँ को अकारण छोड़कर मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है। बुढ़ापे में तो मुझे उनकी सेवा करनी चाहिए थी, न कि यों उन्हें छोड़ देना चाहिए था। वह मन ही मन सोचता और अपने आपको धिक्कारता । किशू ने अनेकों बार काली से माँ के पास लौट चलने का आग्रह किया पर वह किसी भी प्रकार तैयार न हुई ।

कुछ समय बाद काली के एक बच्चा भी हो गया। किशू ने बच्चे के प्रति अपने मन में उमड़ती भावनाओं से यह अनुभव कर लिया कि माता-पिता बच्चों को कितना प्यार करते हैं। मेरी माँ ने मुझसे भी न जाने कितनी आशाएँ की होंगी, वह मन ही मन सोचा करता।

एक दिन बहुत बड़ी दुर्घटना घट गई। किशू और काली पास-पास बैठे थे। उनके बीच में बच्चा लेटा हुआ था। तभी अचानक पीछे से एक भेड़िया आया और दबे पैरों आकर बच्चे को ले भागा। किशू और काली ने जब मुड़कर देखा तो भेड़िया भागकर दूर जा चुका था। वे हा-हाकार करते हुए उसके पीछे दौड़े, भेड़िया और भी तेज भागा और कुछ ही देर में उड़नछू हो गया।

किशू और काली दोनों बहुत दूर तक भागे परंतु उनके हाथ कुछ न लगा। काली तो बच्चे के शोक में बाबली सी हो गई। वह छाती पीट-पीट कर करुण क्रंदन कर रही थी- हाय मेरे बेटे, हाय मेरे लाल । किशू बड़ी कठिनाई से उसे समझा कर वापिस लाया।

अब काली का खाना-पीना सभी छूट गया। वह चौबीसों घंटे बैठी अपने बच्चे को याद करती रहती थी। अपने बेटे को खोकर किसी माँ को कैसा लगता है-यह अब उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था। वह किशू से कहती- मैंने तुम्हारी माँ से अलग किया है न। भगवान ने उसी का दंड तो मुझे दिया है।’

उधर अब चंपा का हाल भी सुनिए।सुबह उठकर जब उसने बेटे-बहू को पेड़ पर नहीं पाया तो वह सोचने लगी कि प्रातः घूमने चले गए होंगे, घूम-फिरकर नाश्ता करके थोड़ी देर में लौट आएँगे।

वह भूखी प्यासी बैठी उनकी प्रतीक्षा करती रही, पर रात तक भी जब बहू-बेटे नहीं लौटे तो वह बड़ी चिंतित हुई। बेचारी अपने अशक्त शरीर से खाँसती-लड़खड़ाती आस-पास की सारी जगह देख आई, पर किशू और काली वहाँ होते तो मिलते।

दूसरे दिन चंपा फिर प्रातः से ही अपने अभियान पर निकली। वह जंगल का चप्पा-चप्पा छान आई पर बहू-बेटे का कहीं पता न लगा। हाँ, भाऊजी उल्लू ने यह जरूर बताया कि उसके बहू-बेटे को इस जंगल की सीमा को पारकर आगे बढ़ते देखा था।

भाऊजी की बात सुनकर चंपा का हृदय रो उठा। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी। ‘हाँ बेटा, कौन-सा अपराध किया था मैंने जो तुम मुझे छोड़कर चले गए वह हड़बड़ाई और फिर अचेत हो गई। पास से गुजरने वाली कांता हथिनी ने उसके मुँह पर पानी के छींटे लगाए, जैसे-तैसे उसे होश आया । दुःख को अपने हृदय में छिपाए थके-हारे कदमों से जैसे-तैसे वह घर की ओर लौटी।

चंपा अब समझ गई थी कि उसका बेटा जान-बूझकर उसे छोड़ कर गया है। उसकी निष्ठुरता ने चंपा के हृदय पर गहरा आघात पहुँचाया था। सारा संसार उसे नीरस जान पड़ा। किसी काम में उसका मन न लगता था। घर तो मानो उसे काटने को दौड़ता था। वह सुबह होते ही घर से निकल पड़ती और यों ही सारे जंगल में इधर-उधर घूमती-भटकती। रात होने पर ही घर लौटती और चुपचाप सो जाती।

एक दिन चंपा यों ही घूमती हुई बहुत दूर भेड़िये की भाँद के पास निकल गई, वहाँ उसने अद्भुत दृश्य देखा और चौंक उठी। भेड़िए के बच्चों के पास बंदर का भी एक बच्चा बैठा था। चंपा ने आँखें फाड़-फाड़कर देखा।

हाँ वह बंदर का ही बच्चा था। यह तो हमारी जाति का बच्चा है। यह तो हमारी जाति का बच्चा है । भेड़िया कहीं इसे खा न जाए, वह बुदबुदाई।’ मुझे इस नन्हें बच्चे की रक्षा करनी ही चाहिए’ वह मन ही मन बोली। फिर वह अपनी जान को जोखिम में डालकर चुपके से बंदर का बच्चा उठा लाई और पेड़ पर चढ़ गयी । भेड़िया ने देखा तो वह आग बबूला हो उठा।

उसने चंपा को बहुत धमकाया, बहुत लालच दिया पर वह बच्चा वापिस करने के लिए टस से मस न हुई। हारकर भेड़िया को ही वापिस जाना पड़ा।

भेड़िया के चले जाने पर चंपा भी एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाती हुई जंगल पार करने लगी। उसे डर था कि भेड़िया कहीं पास ही न छिपा हो और कहीं फिर आकर बच्चा न झपट ले, इसलिए वह ऐसा कर रही थी।

पेड़-पेड़ पर से जाने के कारण चंपा रास्ता भटक गई और दूसरे जंगल में जा पहुँची। चलते-चलते जब वह थक गई और साँझ का झुटपुटा भी हो गया तो वह बच्चे को लेकर एक पेड़ पर बैठ गई। उस पेड़ की एक ऊँची डाली पर किशू और काली बैठे हुए थे। चंपा ने उन्हें नहीं देखा था। चंपा ने आराम से बैठने पर बच्चा अपनी छाती से अलग करके डाल पर बैठाया।

बच्चे को जोरों की भूख लगी थी, वह चिचिआने लगा। आवाज सुनकर काली की निगाह सहसा नीचे गई। ‘मेरा बच्चा मेरा नन्हा’ कहकर वह तेजी से कूद पड़ी और बच्चे को कसकर छाती से लगा लिया। अब तक किशू का ध्यान भी बट चुका था। उसने माँ को नीचे बैठे देखा तो वह भी ‘अम्मा अम्मा’ कहकर उससे लिपट गया। किशू, काली और चंपा तीनों की आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने एक दूसरे को अपनी-अपनी बात सुनाई।

दूसरे दिन प्रातःकाल ही चंपा घर जाने को तैयार हो गई, जब वह चलने लगी तो किशू ने उसका रास्ता रोक लिया और कहने लगा-‘अकेली कहाँ जाओगी अम्मा, हम भी तो तुम्हारे साथ ही चलेंगे।’

काली चंपा के पैरों पर गिर पड़ी और कहने लगी-माँ जी, मुझेक्षमा कर दीजिए। मैंने बुरे विचारों से परिवार के टुकड़े कर दिए। मिल-जुलकर रहने के, बड़ों की सेवा करने के महत्त्व को मैं तब नहीं समझती थी, पर अब मुझे यह समझ आ गई कि माँ बच्चे के लिए कितना त्याग करती है, कितना कष्ट सहती है और उससे कितनी आशायें रखती है।

बच्चे का भी कर्त्तव्य हो जाता है कि वह बड़ा होकर माता-पिता की सेवा करे। जो ऐसा नहीं करता उल्टे अपने माता-पिता से बुरा बोलता है, व्यवहार करता है उसे धिक्कार है।’

‘हाँ माँ, स्नेह और त्याग से भरा परिवार ही स्वर्ग का सुख देता है, किशू भी गंभीर होते हुए बोला। चंपा ने काली को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। प्रसन्नता उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

भगवान् तुम्हारे विचार ऐसे ही बनाए रखे काली और किशू के सिर पर हाथ फिराती हुई वह बोली। इसके बाद चंपा, किशू, काली और नन्हा सभी अपने पुराने घर की ओर लौट चले। उसके हृदय में मिल-जुलकर रहने, प्यार और सहकार भरा स्वर्गीय परिवार बसाने की भावनाएँ हिलोरें ले रही थीं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *